jila sakti

जब जीवन का हर कर्म ईश्वर के प्रति समर्पण और लोकमंगल की भावना से किया जाता है, तब साधारण कार्य भी यज्ञ बन जाते लाला चंद्रा आचार्य सरस्वती शिशु मंदिर तुषार

कर्तव्य और औपचारिकता — एक आध्यात्मिक चिंतनऔपचारिकता वह है जो हम समाज को दिखाने के लिए करते हैं, जबकि कर्तव्य वह है जो हम अपनी आत्मा की पुकार पर करते हैं। औपचारिकता में बाहरी प्रदर्शन अधिक होता है, कर्तव्य में आंतरिक निष्ठा और समर्पण।अध्यात्म हमें सिखाता है कि जीवन को औपचारिकताओं का मंच नहीं, बल्कि कर्तव्यों की साधना बनाना चाहिए। पूजा, प्रार्थना, जप, ध्यान और सेवा—यदि केवल परंपरा निभाने के लिए किए जाएँ तो वे औपचारिकता रह जाते हैं; किंतु यदि उनमें श्रद्धा, आत्मसमर्पण और आत्म-विकास का भाव जुड़ जाए तो वे साधना बन जाते हैं।कर्तव्य का संबंध कर्म से है, पर उसका स्रोत विवेक और संवेदना है। औपचारिकता का संबंध कर्म से है, पर उसका स्रोत प्रायः सामाजिक दबाव या दिखावा होता है। इसलिए कर्तव्य आत्मा को ऊँचा उठाता है, जबकि औपचारिकता केवल सामाजिक व्यवस्था को निभाती है।सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति वही है जो अपने प्रत्येक कार्य को कर्तव्य समझकर करे, न कि केवल औपचारिकता मानकर। जब जीवन का हर कर्म ईश्वर के प्रति समर्पण और लोकमंगल की भावना से किया जाता है, तब साधारण कार्य भी यज्ञ बन जाते हैं।“औपचारिकता लोगों को संतुष्ट करती है,

Khilawan Prasad Dwivedi

Sakti Samachar News is one of the biggest Hindi News portal where you can read updated Hindi News on Politics, Sports, Business, World, Entertainment etc.

Related Articles