अवध बिहारी जी, दुबे सतना .दशहरा भारत का बहुत पुराना राज-पर्व है, इसलिए मुगल और अंग्रेज दोनों के समय इसका रूप अलग-अलग रहा।

अवध बिहारी जी, दुबे सतना दशहरा भारत का बहुत पुराना राज-पर्व है, इसलिए मुगल और अंग्रेज दोनों के समय इसका रूप अलग-अलग रहा -1. मुगल काल में – अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ के समय में – दशहरा, दिवाली, होली को दरबार में मान्यता थी।
अकबर तो स्वयं झरोखा दर्शन और विजयादशमी पर राज-तिलक जैसा उत्सव देखता था। आम जनता को मेला-रामलीला की पूरी छूट थी।-
औरंगजेब के समय में रोक लगी। उसके फरमान से बड़े मेलों, रामलीला में भीड़, बाजे-गाजे पर पाबंदी लगाई गई, जजिया जैसा दबाव बनाया गया।
कई जगह जमींदारों को छुप-छुप कर दशहरा मनाना पड़ता था।- बाद के कमजोर मुगलों में फिर से स्थानीय राजाओं जैसे बुंदेलखंड के बुंदेलों, चित्रकूट-मानिकपुर के राजाओं ने दशहरा को अपने शौर्य प्रदर्शन के रूप में मनाया। 2. अंग्रेजी शासन में -अंग्रेजों की नीति थी – _”धर्म में दखल नहीं, पर कानून व्यवस्था हमारी”_।- दशहरा मेला, रामलीला, दुर्गा पूजा को अनुमति लेनी पड़ती थी।
थानेदार को अर्जी देनी होती थी, कितने लोग आएंगे, कितने बाजे बजेंगे।- 1857 के बाद अंग्रेज और चौकन्ने हो गए। वे दशहरे के मेले को भीड़-भड़का मान कर निगरानी करते थे,
CID के सिपाही सादे कपड़ों में घूमते थे कि कहीं राष्ट्रवादी भाषण तो नहीं हो रहा।- साथ ही उन्होंने दशहरा को “हथियार पूजा” तक सीमित करने की कोशिश की, ताकि रियासतों के राजा अपनी सेना का प्रदर्शन न कर सकें।फर्क यही था – मुगल धर्म के आधार पर रोक-छूट करते थे, अंग्रेज कानून-व्यवस्था के नाम पर नियंत्रण करते थे।पर जनता ने कभी दशहरा मनाना नहीं छोड़ा। तभी तो आप आज भी कहते हैं – बोली हमेशा गोली पर भारी पड़ेगी।